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जौनसार-बावर: दशहरे पर रावण नहीं, गागली युद्ध की परंपरा निभाते हैं उद्पाल्टा और कुरौली गांव

जौनसार-बावर की अनूठी परंपरा दशहरे के अवसर पर एक बार फिर जीवंत हुई। उद्पाल्टा और कुरौली गांव के ग्रामीणों ने गुरुवार को पाइंता पर्व पर सदियों से चली आ रही गागली युद्ध की परंपरा निभाई।

क्याणी डांडा स्थित कुएं पर ग्रामीणों ने पहले घास-फूस से बनी रानी और मुन्नी की प्रतिमाओं का विधिवत विसर्जन किया। इसके बाद दोनों गांवों के लोग अरबी के डंठल और पत्तों को हथियार बनाकर आपस में युद्ध करने लगे। करीब एक घंटे तक चला यह प्रतीकात्मक युद्ध किसी जीत-हार के लिए नहीं, बल्कि रानी-मुन्नी के श्राप से मुक्ति और गांव की खुशहाली के लिए किया जाता है।

युद्ध समाप्त होने के बाद ग्रामीणों ने एक-दूसरे को गले लगाकर बधाई दी और महिलाएं-पुरुष पारंपरिक हारूल, तांदी, रासो और झेंता नृत्य में शामिल हुए।

लोककथा के अनुसार, उद्पाल्टा गांव की दो बालिकाएं—रानी और मुन्नी—पानी भरने कुएं पर जाती थीं। एक दिन रानी कुएं में गिर गई और उसकी मौत हो गई। लोगों ने इसका दोष मुन्नी पर लगाया। व्यथित मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी। माना जाता है कि इसके बाद गांव में अशुभ घटनाएं होने लगीं। महासू देवता के पुजारी ने ग्रामीणों को दशहरे पर रानी-मुन्नी की प्रतिमाओं का विसर्जन और गागली युद्ध करने का उपाय बताया। तभी से यह परंपरा हर साल निभाई जाती है।

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