वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारतीय राजनीति में बढ़ती ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ (खरीद-फरोख्त) को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश किया है। कोच्चि में ‘हॉर्स ट्रेड एंड डेमोक्रेसी’ विषय पर दिए गए अपने व्याख्यान के दौरान, सिब्बल ने संविधान की 10वीं अनुसूची में बड़े बदलाव की वकालत की। उनका सुझाव है कि यदि कोई सांसद या विधायक किसी विशेष पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीत हासिल करने के बाद, दबाव या आर्थिक प्रलोभन के चलते दूसरी पार्टी में शामिल होता है, तो उस पर 10 साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। सिब्बल का तर्क है कि वर्तमान कानून में मौजूद खामियों का फायदा उठाकर ‘दलगत विलय’ के नाम पर सामूहिक पलायन को रोका जाना बेहद जरूरी है।
सिब्बल के इस विचार का समर्थन करते हुए सौरव दास ने इसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक आवश्यक कदम बताया है। हालांकि, दास ने इससे भी अधिक सख्त प्रावधानों की मांग की है। उन्होंने तर्क दिया कि दलबदल करने वाले नेताओं पर न केवल चुनाव लड़ने, बल्कि 20 साल तक किसी भी सार्वजनिक पद पर रहने पर भी रोक लगनी चाहिए। दास ने मौजूदा एंटी-डिफेक्शन कानून की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि सत्तारूढ़ दल अक्सर सत्ता बनाए रखने के लिए इसका दुरुपयोग करते हैं। उन्होंने सांसदों को करोड़ों रुपये देकर खरीदने की प्रवृत्ति को ‘देश के साथ विश्वासघात’ करार दिया और उम्मीद जताई कि युवा पीढ़ी इस दोषपूर्ण व्यवस्था को बदलने का प्रयास करेगी।
दूसरी ओर, इस बहस में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने एक बिल्कुल अलग और विपरीत दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उन्होंने सिब्बल के प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘दल-बदल विरोधी’ कानून अक्सर कमजोर लोकतंत्रों की पहचान होते हैं, जबकि परिपक्व लोकतंत्रों में ऐसे कानूनी प्रतिबंधों की आवश्यकता नहीं होती। गुप्ता के अनुसार, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित लोकतंत्रों में इस तरह के कोई औपचारिक वैधानिक दंड नहीं हैं। इन देशों में राजनीतिक स्थिरता कानून के बजाय पार्टी के आंतरिक अनुशासन, राजनीतिक परंपराओं और मतदाताओं की जवाबदेही पर टिकी होती है। इस प्रकार, सिब्बल का यह प्रस्ताव भारतीय राजनीति के भविष्य और लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती पर एक नई और गंभीर बहस को जन्म दे चुका है।
