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धराली में तबाही का सच आया सामने: इसरो ने 69 लाख किलो हिमखंड को बताया कारण

धराली में आई विनाशकारी जलप्रलय को लेकर अब वैज्ञानिक तस्वीर साफ हो गई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अध्ययन के अनुसार ग्लेशियर क्षेत्र से करीब 0.25 वर्ग किमी (लगभग 75 हजार घन मीटर) का एक विशाल हिमखंड अचानक टूटकर नीचे गिरा। अनुमान है कि करीब 69 लाख किलो बर्फ ढलान की ओर लुढ़की, जो तेज घर्षण के कारण पिघलती गई और देखते ही देखते मलबे से भरी तेज धारा में बदल गई।

कैसे बढ़ी तबाही?

जैसे-जैसे बर्फ और मलबे का वेग बढ़ा, खीर गंगा कैचमेंट के ऊपरी हिस्सों में जमा भारी पत्थर और तलछट भी नीचे की ओर खिसकने लगे। इससे जलप्रवाह और अधिक खतरनाक हो गया। परिणामस्वरूप धराली क्षेत्र में व्यापक तबाही हुई और कई हिस्से पूरी तरह प्रभावित हो गए।

सैटेलाइट से तैयार हुई पूरी टाइमलाइन

ISRO वैज्ञानिकों ने मल्टी-टेम्पोरल सैटेलाइट इमेजरी, हाई-रेजोल्यूशन डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) और स्थानीय वीडियो फुटेज का विश्लेषण कर घटना की क्रमवार जानकारी तैयार की।

जुलाई 2025: लगभग 5,220 मीटर ऊंचाई पर एक बड़ा आइस-पैच दिखाई दिया, जो पिछले 15 वर्षों के रिकॉर्ड में पहले दर्ज नहीं था।

12 अगस्त (पोस्ट-इवेंट इमेज): वही आइस-पैच पूरी तरह गायब मिला और ढलान पर ताजा क्षरण के स्पष्ट निशान देखे गए।

हिमखंड करीब 1,700 मीटर नीचे खीर गंगा चैनल की ओर गिरा और तेजी से मलबा-युक्त धारा में बदल गया।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

3 से 5 अगस्त के बीच वर्षा हल्की से मध्यम थी, क्लाउडबर्स्ट की संभावना नहीं पाई गई।

ऊपरी कैचमेंट क्षेत्र में कोई ग्लेशियल लेक मौजूद नहीं थी, इसलिए झील फटने (GLOF) की आशंका खारिज हुई।

स्थानीय वीडियो में पहले तेज और अचानक मलबे की लहर दिखी, उसके बाद धीमा लेकिन लगातार बहाव रहा — यह पैटर्न सामान्य मानसूनी बाढ़ नहीं, बल्कि मास-रिलीज इवेंट से मेल खाता है।

क्या होता है आइस-पैच?

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि आइस-पैच ग्लेशियर नहीं होता। यह बर्फ, फर्न और जमी हुई परतों का स्थिर द्रव्यमान होता है, जो सामान्यतः बहता नहीं। लेकिन जब यह अस्थिर होकर टूटता है, तो अचानक भारी मात्रा में बर्फ और मलबा नीचे गिर सकता है, जिससे फ्लैश फ्लड जैसी स्थिति बन जाती है।

इस प्रकार, वैज्ञानिक विश्लेषण से साफ हुआ कि धराली की यह आपदा प्राकृतिक हिमखंड टूटने की घटना थी, न कि बादल फटने या झील फटने की वजह से।