हूती विद्रोहियों के बढ़ते प्रभाव से सऊदी अरब की सुरक्षा पर संकट
यमन में हूती विद्रोहियों ने लाल सागर (Red Sea) के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों, विशेषकर बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य और हनीश द्वीपों पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया है। इस बढ़ते खतरे ने सऊदी अरब के लिए सुरक्षा और व्यापारिक संबंधी गंभीर चुनौतियां पैदा कर दी हैं। संकट की इस घड़ी में सऊदी अरब ने अपने प्रमुख सहयोगी पाकिस्तान से सैन्य सहायता की अपील की थी, लेकिन पाकिस्तान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी सेना किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध लड़ने के लिए नहीं भेजेगा। पाकिस्तान का रुख केवल सऊदी अरब की क्षेत्रीय रक्षा तक सीमित रहेगा, जिससे ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ जैसे रक्षा समझौतों की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।
इस कूटनीतिक मोड़ ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान के इनकार के बाद सऊदी अरब ने अमेरिका की मध्यस्थता में इजराइल से खुफिया जानकारी (Intelligence) साझा करने की मांग की है। यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब और इजराइल के बीच कोई औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। गौरतलब है कि अगस्त में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे कई विशेषज्ञ ‘मुस्लिम नाटो’ के रूप में देख रहे थे। हालांकि, हूती हमलों के बाद पाकिस्तान की प्रतिक्रिया ने इस गठबंधन की भविष्य की दिशा पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं। इसके अतिरिक्त, अमेरिका और ब्रिटेन ने भी यमन में सीधे सैन्य संघर्ष में शामिल होने से इनकार कर दिया है; जहां अमेरिका केवल खुफिया मदद दे रहा है, वहीं ब्रिटेन केवल सैन्य सलाहकार देने की बात कह रहा है।
हूती विद्रोहियों के इस विस्तार का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ने की आशंका है। यदि बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के माध्यम से होने वाला समुद्री व्यापार बाधित होता है, तो एशिया और यूरोप के बीच जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) के लंबे रास्ते से होकर गुजरना पड़ेगा। इससे शिपिंग लागत और ईंधन के खर्च में भारी वृद्धि होगी, जिसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों और महंगाई पर पड़ेगा। भारत जैसे देशों के लिए भी यह चिंता का विषय है क्योंकि आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। यमन में पिछले 12 वर्षों से चल रहे गृहयुद्ध ने अब एक नया और खतरनाक मोड़ ले लिया है, जिससे पूरे मध्य पूर्व (Middle East) की स्थिरता दांव पर लगी है।
