1965 युद्ध के महानायक: जब लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर के पराक्रम ने पाकिस्तानी सेना के छक्के छुड़ा दिए

1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर तारापोर की वीरता की वो गाथा, जिसने दुश्मन के 60 टैंकों को ध्वस्त कर भारतीय सेना की जीत सुनिश्चित की।

1965 युद्ध के महानायक: जब लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर के पराक्रम ने पाकिस्तानी सेना के छक्के छुड़ा दिए

1965 के युद्ध का वो निर्णायक मोड़, जहाँ तारापोर के साहस ने बदली युद्ध की दिशा

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर की कमान में ’17 हॉर्स’ रेजिमेंट ने वो ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया, जिसने दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए। जब पाकिस्तानी सेना ने चाविंडा और फिलोरा के बीच मोर्चा संभाला हुआ था, तब तारापोर ने एक बेहद साहसी रणनीति के तहत फिलोरा पर अचानक हमला बोल दिया। इस भीषण संघर्ष के दौरान भारतीय सेना ने न केवल दुश्मन के 13 टैंकों को ध्वस्त किया, बल्कि पाकिस्तानी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। वजीरअली पर भारतीय सेना के कब्जे ने इस पूरी लड़ाई का रुख पूरी तरह से भारत के पक्ष में मोड़ दिया।

घायल होने के बावजूद नहीं थमा हौसला: वजीरअली से जस्सोरां तक का सफर

युद्ध के मैदान में जबरदस्त गोलाबारी और टैंकों की टक्कर के बीच लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर गंभीर रूप से घायल हो गए थे, लेकिन उनकी वीरता की चमक एक पल के लिए भी कम नहीं हुई। घायल अवस्था में भी उन्होंने हार नहीं मानी और 13-14 सितंबर के बीच वजीरअली, जसोरन और बुतुर-डोगरांडी जैसे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों पर कब्जा करने के लिए अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया। 16 सितंबर तक, उनकी अटूट इच्छाशक्ति और आक्रामक रणनीति के कारण भारतीय सेना ने जस्सोरां, बुतुर और डोगरांडी पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।

“तारापोर के नेतृत्व में भारतीय रेजिमेंट ने दुश्मन के लगभग 60 टैंकों को तबाह कर दिया, जबकि हमारे नुकसान में केवल 9 टैंक ही शामिल थे।”

तारापोर की वीरता की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब उन्होंने अंत तक लड़ते हुए दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों को धूल चटाई। हालांकि, 16 सितंबर को एक दुश्मन के गोले की चपेट में आने से उनके टैंक में भीषण आग लग गई। एक सच्चे सैन्य लीडर की तरह, वे अपनी टुकड़ी का मार्गदर्शन करते हुए युद्ध के मैदान में ही शहीद हो गए। उनकी इस अतुलनीय बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से नवाजा गया। उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए, 17 सितंबर 1965 को जसोरां में युद्ध के मैदान में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया।

विरासत और गौरवशाली इतिहास: शिवाजी के योद्धाओं का वंशज

लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जिसका इतिहास वीरता से भरा है। उनके पूर्वज रतनजीबा ने छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में सेवा की थी। तारापोर का सैन्य करियर भी असाधारण रहा; एक ग्रेनेड बचाव की साहसी घटना ने उन्हें आर्मर्ड फोर्सेज में जाने का सुनहरा अवसर दिलाया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मिडिल ईस्ट में सेवा देने के बाद, वे ‘पूना हॉर्स’ के कमांडिंग ऑफिसर बने।

आज उनकी वीरता की स्मृति को अमर रखने के लिए भारत सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के एक द्वीप का नाम उनके सम्मान में रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया यह सम्मान उन सभी वीर सपूतों के प्रति एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।