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धराली आपदा: जीवनरक्षक बना हारदूद मेला, समेश्वर देवता की छांव में बचीं सैकड़ों जानें

उत्तरकाशी के धराली गांव में आई भीषण अतिवृष्टि ने पलक झपकते ही घर, बाजार और खेत उजाड़ दिए। लेकिन इस आपदा के बीच एक पारंपरिक आयोजन अनजाने में सैकड़ों लोगों के लिए जीवन ढाल बन गया। यह था हारदूद मेला, जो हर साल श्रावण मास में समेश्वर देवता की विशेष पूजा के साथ मनाया जाता है।

आपदा की रात, पूरे गांव के लोग समेश्वर देवता के मंदिर में पूजा-अर्चना में जुटे थे। प्रत्यक्षदर्शी रजनीश पंवार बताते हैं—“अगर हम मंदिर में नहीं होते, तो शायद उस वक्त धराली बाजार में होते… और बाजार तो पूरी तरह बह गया।”

श्रावण मास का यह मेला धराली, मुखवा और आसपास के गांवों की आस्था का केंद्र है। बुग्यालों से लाए गए ब्रह्म कमल और जयान जैसे दुर्लभ फूल देवता को अर्पित किए जाते हैं। पहले दिन रात्रि पूजा और विशेष अनुष्ठान होते हैं, जबकि दूसरे दिन देव आराधना के साथ मेला सम्पन्न होता है।

आज गांव के हर घर में समेश्वर देवता के प्रांगण में पूजा करती भीड़ की तस्वीर टंगी है—एक याद, एक विश्वास, और एक आभार कि कठिनतम घड़ी में भगवान ने अपने भक्तों को बचा लिया। धराली के लोग कहते हैं—“धरती डोली, घर बहे, बाजार उजड़े, लेकिन आस्था की छांव ने हमें सुरक्षित रखा।”

यह घटना साबित करती है कि परंपराएं केवल संस्कृति की पहचान नहीं, बल्कि कभी-कभी जीवन की रक्षा करने वाली अदृश्य शक्ति भी बन जाती हैं।

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